जब फूल खिलते हैं ढलान पर – कविता: मनोज शर्मा

दूर कोई बांसुरी बजा रहा है
और चल रहा हूं
मैं

कांधे पर लटका थैला
पुस्तकों से भरा है
सामने सूनी है सड़क
चल रहा हूं मैं

रात ने जब ख़ामोशी पहनी
मैं
अपने कुछ और करीब हो गया
ऐसा कुछ घट रहा था उस वक़्त
जिसका पता कतई नहीं चल रहा था

चलते-चलते लगा
अकारण नहीं रहा
दांडी-मार्च
ऐसा भी लगा
हो नहीं सकते हैं क्या
सत्य के और भी प्रयोग
या फिर ऐसी पसरी बर्फ़ को तोड़ते हैं
गोली दागते पोस्टर ही

पृष्ठ पलटते जाते हैं स्वत:
रातें आते-जाती हैं स्वत:
आँखें बहती जाती हैं स्वत:

चलते रहने के भी कई पड़ाव होते हैं
जैसे उम्र की ढलान पर
बहती नदी में
बची रहती है केवल रेत ही
जैसे सांसों में बचा रहता है धुआँ
जैसे अपनों का दबा गुस्सा अचानक फूटने लगता है
जैसे आप सिकुड़ना शुरू कर जाते हैं

दूर,पहाड़ी के उस ओर से
इस बीच आहट आती है
सरसराता है कांधे लटका थैला
माथे पर सजाए
सूरज
काँख में दबाए निबंधों का पुलिंदा
वह ऐसे आता है कि
जीवन पर फैन्की तमाम लानतों को
दरकिनार कर जाता है

असहायों,अनपढ़ों,असंगतों के लिए
दर्जनों सुनहरे सपनों संग वह आता है
और दुख की घुप्पा कोठरियों की
खुलने लगतीं हैं सांकलें
लानतों के कबाड़ के लिए नहीं बचती
धरती

जैसे ही
उतारता है अपनी हैट
ढलानों पर फूल खिल जाते हैं
रात की दरारों से दाखिल होती है
ऊष्णता
फिर से बांसुरी की धुन में खो जाता हूं
मैं

एक पूरी कल्पना है यहाँ
एक ठेठ समाज है
यहाँ भरा-पूरा स्वराज है।

– मनोज शर्मा
प्रतिरोध की कविता के जाने-माने कवि।
एक्टिविस्ट पत्रकार – अनुवादक – कवि – साहित्यकार।
इनके काव्य संग्रह हैं, यथार्थ के घेरे में, यकीन मानो मैं आऊंगा, बीता लौटता है और ऐसे समय में।
उद्भाव ना पल प्रतिपल आदि के कविता विशेषांक आदि में संपादकीय सहयोग।
इनकी कविताओं का अनुवाद डोंगरी पंजाबी मराठी अंग्रेजी आदि में।
संस्कृति मंच की स्थापना जम्मू में।
संप्रति नाबार्ड में उच्च पोस्ट पर।

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